शब्द सारथी

काफी दिनों से कुछ नियम छूटा हुआ सा है… इस वर्ष की शुरुआत में तय किया था कि रोज़ लिखेंगे और खूब लिखेंगे पर शायद विचार गहरे नहीं हुए थे.. या नियम नहीं बना पाई … फिर तय करना कि सच … रोज़ … हो पायेगा … इस भाग दौड़  में … जहाँ शब्द आजकल मूक रहना जियादा पसंद करते हैं… या तय नहीं कर पाते उनके आने से कुछ फर्क पड़ेगा… जाने कैसे सी सकुचाहट हैं …मैंने तो नहीं रोका … खुद ही ठिठके से रहते हैं … या मिल के गुम जाते हैं…

…. मेरे सारथी मेरे शब्द…

…अभी तो बहोत जगह जाना है

… कई जगह हो आना है ….

ख़ामोशी भी निशब्द नहीं  –

ख़ामोशी में सिर्फ आवाज़ नहीं …

ख़ामोशी के पार …

शब्द सरोवर में

गोता लगा आना है ..

चलो सारथी ….

तिनका हो …

या फूलों का मंज़र ..

या पूरा ही बागीचा हो…

कहो सारथी ..अब पथ पर निरंतर हमको चलना है..

कैसे कैसे घटित हुआ …

पृथ्वी के आर पार …

अंतरिक्ष के कई छोर …

चाँद की शीतल ज़मीन …

सूरज की चमकीली लौ …

तारों की टोली वोली …

चलो सारथी …

इन साँसों से उन साँसों तक ….

जो उठता गिरता ताना बाना …

इक तार या दो  तार पे …

इनका कौतुक इठलाना ….

चलो सारथी …चलते हैं …

घने जंगलों में

जिस  बरगद पे झूला  झूलेंगे

उसी  के राजा से फिर रस्ता नया  पूछेंगे

… थक जाओ तो झरनों के कनारे कुछ पल यूँ ही सोयेंगे

… फिर उठेंगे और चलेंगे ….

चलो सारथी …

अब काव्य पथ पर निरंतर हमको चलना है

चलो सारथी …

तृप्ति (१३ मई २०२०)

 

आती तो है……!

आती तो है … पर वो बात नहीं

वो वक़्त बेवक्त सी चहलकदमी

फुसफुसा जाना

छेड़ना…

चुप सी थपकियों में सिमट

गुम जाती है कहीं

जाने क्या कहे और

झड़ी लग जाये..

आती तो है…

बुलाती भी नहीं

न खबर लेती हूँ

कहाँ खोयी हो पूछती तो हूँ

पर जवाब का इंतज़ार नहीं

आती तो है

घूम फिर जाती है

कुछ टटोलती

पीछे नहीं पड़ती

न खफा होती है

आती तो है…

शक्ल क्या बदल गयी

या छाप मेरी भूल गयी

क्यूँ नहीं है बांधती

क्यूँ नहीं ये रोकती

कब हंसी पलट जाये

इसलिए नहीं टोकती

आती तो है …

बात मेरी मान लो

गुफ्तगू को जान लो

बस यूँ ही सिफर सिफ़र

न कह मेरी सहर सहर

….आती तो है…

यूँ बूझने की बात

फिर करो तो आप

यूँ ठहर ठहर

शाद भी खिले जनाब

आती तो है…

थाम शायद लेंगे हाथ

उँगलियों के पोरों से

कोरी ज़मीनों पे

कुछ खेंच लेंगे ही

कुछ समेंट लेंगे ही …

आती तो है… आती रहेगी सदा…

 

 

 

 

 

लिखना भी चलने से कम नहीं !

यूँ कहैं तो मालूम नहीं के लिखना क्या है… पर जो अब लिखने चले हैं तो लिखते हैं.. सही है… लिखना भी चलने से कम नहीं.. इक कदम का ताल मेल है.. उंगलिया जब फिरती हैं अक्षरों की मुंडेरों पे तो ये सीधी चाल तो होती नहीं , कुछ थिरकती हैं कुछ इधर उधर डोलती हैं… चलतीं तो हैं हाँ सीधी दिशा नहीं चलतीं .. शायद लेखक भी चाह कर सीधा नहीं चल पता… घूम फिर आता उन्हीं पन्नों पे है पर सीधी चाल सिर्फ भाषा की डोर लिए दिखतीं हैं… वो जो अंतस में बेडोल उमड़ता घुमड़ता सा बादल है उन्हें ही शायद टपका सा डालता है.. फिर पन्नो की हडबडाहट सुनी है कभी .. खैर .. लिखने वाले जब चलते हैं तो बाई से दायीं को जाते हैं .. ये उनका और पन्नों के बीच का समझौता नहीं यहाँ भी कुछ नियम के कयास हैं… अंतस का कोई नियम नहीं … कहीं भी कभी भी घूम जाता है. इस से किसी को सरोकार नहीं .. कोई जानना भी नहीं चाहता है.. कह दो तो भी लोग गवाह मांगेंगे … अब लाओ गवाह …. खैर ..चल रहे थे शायद… कहो कितना चल लिए यही कोई दस कदम नहीं शायद सौ.. क्या फर्क पड़ता है…

के वो कह रहे हैं

कुछ कहा है

हमने नहीं सुना

हमने कब कहा है

फिर भी ये मंज़र है

की न कुछ कहा है

न हमने कुछ सुना है

तृप्ति

ये क्या कम है!

गर हो उनसा हौसला … तो फिजाँ को नाज़ है

वो जो चल पड़े तो … तो खिलता है आसमां

जुबान गर आपके चुप में भी बोलती है .. तो समझिये के कुछ रह गया कहने को

ज़िन्दगी की इस भाग दौड़ में सुना काफी देखा काफी .. पर जो वो दिन भर समेंट से आये वो शायद कहीं अटका तलाशता है अपनी ही आज़ादी को…

कभी इसे अपनी कभी किसी और से आती मान बांचने की कोशिश करते हैं… कभी होती है कभी नहीं

ज़िन्दगी कई अनकही कहानियों का तानाबाना है..हम आगे चले जाते हैं और कहानियां छूट जातीं हैं .. या जब उनका सिर पैर न समझ आये तो एक अनुभव का नाम दे तसल्ली ले लेते हैं..

न कहानियां ही पूरी होती हैं न हमारी तसल्ली..

पर हाँ आईना देखते हैं और कहते हैं.. यार बड़ा छोटा दाएरा था तुम्हारा … इतने खूबसूरत लोग हैं यहाँ …

फिर जाने क्यूँ सिमट सी रही …

कुछ उनकी रौनके आयीं कुछ उनकी अमीरियत और हमें अपनी गरीबी पे होश आया

दयेरों में कैद खुद के आगे देखना मुश्किल है नामुमकिन नहीं

पर शायद जब जियादा समझ न आये तो कह देना के हाँ हैं यहाँ … थोड़ी अन्दर की खिड़कियाँ और खोलनी पड़ेंगी ..

पर सच भी यहीं हैं मन भी है जो है सो है.. जो नहीं है वो नहीं है … और जो … नासमझी है वो भी है …और जो समझ के भी किस भेद में छिपी है वो भी … पर आज एक अच्छी बात पढ़ी जो देमाग ने कई बार कही … जिंदगी जीते हैं शायद कुछ न समझना भी कभी कभी बहोत बड़ी समझ है…

“एक तरबियत है उनकी

वो रोज़ बोलते हैं

कहाँ से बोलते हैं किधर से बोलते हैं

हम उनको ढूंढते हैं…

ढूंढना शायद अब नहीं है…

पता तो नहीं पर शायद नापता सही है!

ये क्या कम है की

वो बोलते हैं…

और हम सुन लेते हैं!…

तृप्ति

 

 

मांझे का इक छोर लिए !

आये थे उड़ गए… कुछ कह कुछ सुन चले गए… हमने सोचा था फिर काफिये की लड़ी चलेगी… पर शायद … जल्दी थी… कागजों के आईने में जाने क्या क्या अक्स उभारना चाहते हैं… पर फिर उड़न छु हो चले जाते हैं… जैसे यूँ ही बाँट रहें हैं…. लेनी है इसी वखत तो ले लो… नहीं तो हमारे पास भी वखत नहीं है… सो चले गए…

आजकल के दौर में गर वखत है तो सिर्फ वखत के पास… बाकी सब भाग रहें हैं… कहीं न कहीं … किसी न किसी से

किसी न किसी के लिए …

ये घडी की चक चक सेकंडों वाली … चुप ही न होती है… जाने क्या समझ इसे बनाया गया था … इसका नाम सेकंड क्यूँ रखा… फर्स्ट क्यूँ नहीं… ये भी एक    कहानी है ढूंढनी पड़ेगी…

तो अमूमन हर दिन लिखने की ख्वाईश लिए हमने भी पहल शुरू की है… सेकंड गर रुकता नहीं तो हम जियादा पीछे नहीं हैं… बस उसकी तरेह हमने दिन तय कर लिया है…

कुछ चुप सा है मुआमला पर ठीक है जनाब

बोलियाँ भी कब किसी हुईं भला

आज कुछ कह जातीं हैं

कल कुछ

—–तो वो जो कुछ कहे जा रहे थे कल उनको बांचे या आज की नमीं में ढूँढें कोई गिला

शर्त पाक हो या आपसी ज़िरेह

इस मंज़र का कौन सा सिरा

…… जिस कारवां में शामिल वो खाब का यकीन

….. उस कारवां में कामिल वो शाद सा हसीं

…………………………………………………………जो दिखे वो कल इस तरेह

….मांझे का इक छोर लिए …. रुख को देखते …

….. हवा है …बहती भी है बहकती भी है ..

…. कभी कभी कम कभी कभी जियादा …

तृप्ति

 

अंतर्ध्वनि!

ध्वनि कुछ परेशान सी घूम रही थी.. उसे पता नहीं था ये अंतर जो था वो क्या था.. किस किस्म का शोर यूँ बडबडा कर उसके ही होठों से चला जाता और वो समझ भी न पाती … क्या था ये … क्या ये सच था या उसका कोई वहम … या कोई टोटका … अपने इस टोटके की बात को  खारिज करती हुई वो फिर उहापोह में जुट गयी… क्यूँ … एक एहम सवाल है.. उसे जवाब चाहिए था… जब वो ध्वनि थी तो .. उसे किसकी ध्वनि उसी की ही जुबा से आती थी…

कहीं भी कैसी भी खड़ी हो बैठी हो .. चलते फिरते … गूंजती से वो आवाज़ …. मोहब्बत… ये नया क्या था.. नया नाम फिर से…

और वो जो उसे कभी हंसाता था कभी खीजाता था… के ये कैसा सा सवाल है …

तुम्हरी शादी हो गयी है..

वो कहती … हाँ …

क्यूँ हो गयी है… ?

और चुप्पी…

कुछ अजीब सी कड़ी के ये शब्द … क्यों पे तो जाने क्यूँ उसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार लगता था.. फिर ये … ये कैसे से सवाल थे.. क्यूँ थे… जाने कितने सालों से इन सवालों और भी न जाने कुछ कुछ अजीब सी बातें … कुछ समझ आतीं कुछ नहीं… कौन सा साया था ये…ध्वनि ने अंतर से कहा… खूब खेल रहे हो .. मेरा भी दिन आएगा… यूँ कोई छिप कर सवाल करता है क्या … सामने में क्या दिक्कत थी ….

ये कैसी सी अमीरियत की बोली थी .. जिसने बोलना तो था …. पर सामने खर्च नहीं करना था..

शायद कुछ अब भी अमीर लोग हैं इस दुनिया में जो यूँ ही ख़त लिखते हैं हवाओं में… पैगाम किसी और का … पास किसी और के… समझ आया उसे … हाँ सच था… वो कैसे भूल गयी…

कई अंतरों में कसमसाते से शब्द और किसके पास आते … ध्वनि है वो…

सो खोये से भटके से … परेशान से …. न कनारा मिले शब्द शायद उसके पास आते थे… कुछ जीवंत लम्हों के लिए

तृप्ति

14 मार्च 2018

 

बेवजह…मूढ़ लोग!

आजकल नाराज़ होना आसाँ हो गया है… खुद से नाराजी नहीं होती… खबर ही खबर है और हर खबर पे नाराज़ी.. नाराज़ी है तो कोई गुनेहगार भी… कोई गुनेहगार है तो सजा का हक़दार भी … बड़ा आसाँ सा हो चला है नाराज़गी का कारोबार … सब आप ही कोतवाल है आप ही जज … सजा तय हो जाती है … कुसूरवार का नाम ले दस पांच बातें हो जाती हैं … और फिर… फिर सब एक ठंडी नींद ले दूसरे दिन फिर किसी कुसूरवार को ढूंढते हैं .. भाई नाराज़ी के कारोबार हैं.. नाराज़ होना अब जन्मसिद्ध अधिकार… अभिव्यक्ति  … बकरा ढूंढ … चैन की नींद दे देती है… कहो नाराज़गी में कुछ लिखा क्या…कोई नहीं कल लिख देना… नहीं तो बोल देना…

क्यूँ  पूछना खुद से … बेवजह… खुद को अपराधबोध से मुक्ति कैसे मिले… जिम्मेवारी जब किसी पे डाल दी जाती है तो फिर हम आज़ाद हो जाते हैं … फिर अपनी जिम्मेवारी का एहसास नहीं कचोटता … फिर कोई अपराधबोध दरवाज़ा नहीं खटखटाता …क्यूँ दे उसे खटखटाने वो रूह टटोलता है… कई सवाल करता है… आपका आपके हिस्से का सवाल पूछता है… क्यूँ दो उसे अन्दर आने … बेवजह … हथकड़ियां हैं न उस बेवक़ूफ़ के हाथ …हाँ हाँ …वही … वो …

खुद से नाराजी क्यूँ हो भला …इतनी नाराज़ी की लडाई लड़ी… भगत सिंह सी … मुंह तोड़ जवाब दिया है.. पीठ थपथपा चैन हुआ है… भारतीयता का परिचय हुआ है…

जब लडखडाई सी आत्मा कभी कहीं नींद में … बडबडा देती है तो उसे सपना दिखा देते हैं …

आज़ादी के ये फालतू के जिम्मेदारी वाले  सवाल  … क्या कर सकती हूँ मैं … क्या किया मैंने… कैसे बेहतर किया जा सके इसे क्या वजेह थी के ये हुआ… क्या करूँ के फिर न हो… मेरा क्या योगदान हो सकता है इस सबमें … या मेरी क्या भूमिका होगी इसे बेहतर बनाने में … 

पर ये धैर्य की सोच थी … गहरी थी… कुछ परिश्रम कुछ कर्म की बात थी… इसकी फुर्सत किसे है… नाराजी बता दी … काम हो गया …

हाँ हैं कुछ बेवजह  वाले लोग … हैं लोग जो इसके लिए तनख्वाह पा रहे हैं … और कुछ और मूढ़ लोग जो दिन रात दुरुस्ती में लगे हैं … नाराज़ी है उन्हें भी  …हाँ… पर उसके बाद कुछ सवाल हैं … अपने आप से … और अपनी भूमिका पे … और वो कुछ तार सुधारने में लगे हैं … भला और किसे फुर्सत है… जाने कैसे मूढ़ लोग

बहोत शोर है … पर इस शोर भरी राष्ट्रवादिता में नए साहसी कदम कम दिखते हैं … एक दूसरे की तरफ गलतियों की पंचायत ज़रूर बैठने लगी है..

बिगड़े हुए को बिगड़ा कहना आसाँ तो है …उसे ठीक करना कैसा रहेगा …

सुस्त अस्पताल के कर्मचारी ..सुस्त चिकित्सक … पर ऐसी किस चीज़ ने उस कंपनी को इंसानियत भूलने  पे मजबूर कर दिया .. …देश के सभी बड़े मिनिस्टर और प्रधानमंत्री ट्विटर पे हैं … एक बात लिखी जाती … तो क्या उसपे कोई कार्यवाही नहीं होती…  ख़त लिख कर कह देते .. पैसे नहीं  मिले हैं… पर हम एक भी जान जाने नहीं देंगे … पर मदद कर दो ..ऐसे कितने दिन चलेंगे … अस्पताल था कोई फैक्ट्री नहीं की प्रोडक्शन रुक जाता … कोई घर का चूल्हा नहीं की खाना नहीं बनता… वहां लोगो की… मासूम बच्चों की जान का सवाल था… ऐसी क्या मजबूरी थी… इंसानियत ने सोचना समझना और दौड़ना बंद कर दिया था.. पैसा न मिलना … एक बहोत बड़ी गलती … और परिणाम जानते  हुए भी ये कदम उठाना उससे बड़ी लापरवाही…

आपस में सिर्फ  अब ये कहना ज़रूरी हो गया है भाई इंसान ही समझते हो न… पता नहीं डर लगता है…

ये लो एक और नाराज़ी ….क्यूँ भाई आज़ाद देश में हैं आप… मूढ़ लोग !

Right to Speech है मैडम जी…Right to Responsible Behaviour nahin!… ये खुद की  constitution में लिखा जाता है …ये देखिये हमको किसे ने बताया ही नहीं… लापरवाह …मूढ़ लोग…

” खुद से सवाल …कुछ बेमिसाल
कुछ हुआ हो तो कमाल है …
वरना फिर साल दर साल है….

और बाल की खाल है

 

तृप्ति

.

पाठ !

किरण कुछ दिनों से मेट्रो ले रही थी. मेट्रो अपनी ही कहानियां ओढ़े कभी अंधेरों में कभी रौशनी में घूमता न जाने कितनों को कितनी ही मंजिलें पहुंचा रहा था… कुछ चुनिन्दा दिन ही थे हफ्ते के, पर वो सफ़र का वक़्त … जैसे कहानियों का होता … इतने चेहरे …कितनी सांसें कितनी जिंदगियां …कितनी ही बातें… कुछ हँसते कुछ हंसी … कुछ उम्मीद कुछ बेबस… कितने वाकये… कभी कभी तो कहीं देखने की ज़ुरूरत ही नहीं… आप सामना हो जाता था… उसने सोचा था वक़्त मिलेगा तो लिखेगी … पर कुछ बना नहीं …उसने बनाया नहीं…

फ़ोन तो होता था पर वो म्यूजिक नहीं सुनती थी… आस पास की गूँज अलग ही संगीत लिए होती थी… खैर … उसे यूँ चुप कुछ न समझ के भी उस भीड़ का हिस्सा होना अच्छा लगता था…

उसकी समझ के अपने नमूने होते थे  और वो उसी से बढ़ती भी थी…

कुछ दिनों बाद उसे एहसास हुआ के जहाँ से वो चढ़ती थी और जहाँ वो उतरती थी … दोनों जगह गुरुद्वारा था.. ये जान कर बस अच्छा  लगा था उसे…

सिलसिला कुछ महीनों चला …

कहाँ जाती थी… वो कुछ बच्चों को पढ़ाने जाती थी.

घर से जल्दी जल्दी निकलने में वो अक्सर कुछ फल बैग में डाल लेती पर शायद ही उसे भीड़ भरे रास्ते में खाने को मिलता…यूँ ही कभी केले कभी सेब…

उस रोज़ उस रास्ते कुछ भिखारियों की बढ़त सी लगी … पहले तो नहीं थे कब आये.. पर कोई नयी बात थी… उस रोज़ बहोत ही नन्हे बच्चों को लेटा देखा था… कुछ लोग दान दे रहे थे…फिर आगे को बढ़ी फिर वही नज़ारा ….चौंकी वो इस बारी… उसके हाथ बैग को गए फिर भी जैसे कोई रोक रहा था …उसने तो देना था .. उसके पास था…वो दे सकती थी… और जब वो मुड़ी ….तो सिर्फ इक आवाज़ के सहारे के आज शायद किसी और की ज़ुरूरत ख़ास है ..मुड़ी…क्या मुड़ना गलत नहीं था..  कुछ शंकित थी वो…क्यूँ.. उसने दिन से पूछना था…

खैर दिन जैसे आगे को बढ़ा वो भूल गयी. अपने क्लास को गयी …पढाना शुरू करना था… तभी शिखा…शीतल … मेहर की खबर लाये… क्या हुआ ..

आधी हंसी आधी परेशानी साफ़ करते हुए उन्होंने मेहर की सेहत की खबर दी ….. मेहर हॉस्टल में रहती थी और पेट ख़राब हो गया था…

कुछ देर बाद मेहर हांफते हुए …थोड़ी कसमसाती हुई क्लास में दाखिल हुई …

क्या हुआ मेहर ?

मैम वो…

पता नहीं कैसे किरण के मुंह से निकला …कोई बात नहीं …केला खाओगी… और झट से अपने  बैग से दो केले निकाले और उसे दे दिया…

मेहर ने हिचकते हुए ले लिया… मेहर फिर दो घंटे की क्लास कर ले गयी …कोई तकलीफ नहीं हुई उसे…

और किरण …एक अजीब सी रोशन ख़ुशी मिली थी उसे पाठ.jpg …वो आवाज़ कितनी सच्ची थी …

मैम किरण ने आज कुछ सच्चे पाठ  पढ़े थे…

तृप्ति 2015

 

चम्पई चाँदनी !

शाम को घर को आते वक़्त चाँद से खफा हो गए पूछो क्यूँ … इक तो यूँ अचानक दिख गए …हमारी हंसी खिल गयी और हमने सोचा क्यूँ न इनका बारिकपन अपने फ़ोन के कैमरे में कैद कर लें …जब तलक फ़ोन लेके वापिस मुड़े …जनाब बादलों में गुम… अब ये तो केह नहीं सकते थे..थोडा रुको चाँद को बादलों से निकलने दो कुछ तस्वीरे ले लूं फिर घर चलते हैं… सो बैठ गए कार में.. फिर उसी सड़क के लम्बे रास्तों पे जिसपे जमे लोग चलते कम हैं जाम जियादा लगाते हैं … शायद कार में बैठने का एहसास दिल को सुकूं के किसी कोने में ले जाता है वरना ऐसी ट्रैफिक की रेंगती तस्वीर होती है  की कछुआ भी कहे … ये लोग खामखा की मशीनें बनाते हैं … सब की सब ट्रैफिक की बलि चढ़ ही जाते हैं…

आंखें यूँ जल बुझ रहीं थीं के कहाँ पहुंचे ये जानने की भी कोशिश नहीं कर रहे थे… जा रहें हैं पहुँच जायेंगे…

तभी कुछ दिखा … क्या था.. खूबसूरत… एक पेड़ जिसके फूल टिमटिमा रहे थे दूधिया सी रौशनी में … ऐसा लगा जैसे किसी बच्चे ने एक खूबसूरत पेंटिंग की हो और सारे फूल करीने से उसपे सजा दिए हों… मेरी हरकत ऐसी ही थी के मुझे हिला कर कहा गया भी … तुम ठीक तो हो …ऐसे कैसे देख रही हो… पर … ये तो होना था…

दिल्ली के साउथ एक्स मार्किट में कई पेड़ हैं बड़ी बड़ी दुकानों के आस पास. पर कुछ ख़ास ही होगा ये पेड़ जिसके सारे फूल यूँ चमचमा रहे थे… यूँ तो सारा बाज़ार रोशन था …पर इन सब रोशनियों में वो पेड़ अलग सा था…क्यूँ..

पता कैद करने की कोशिश की. पेड़ के पीछे ही Titan का शोरूम है … Titan घडी …

घडी के शोरूम के ठीक  सामने … दूधिया चांदनी नहीं चम्पई चांदनी वाला पेड़… समय …

हाँ समय …कुछ कह रहा था शायद…

मैंने पलट कुछ समझाना चाहा ….. कुछ बोला … नहीं अपनी घडी नहीं देखी…उस पेड़ को मैंने हमेशा के लिए कैद कर लिया था .

स्याह दीप्ती!

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स्पंदन है ..स्नेह है ..स्निग्ध.. जीवन है.. क्या ?.. सूरज की किरणों में घूम के देखिये .. उसका एक कण चुरा के देखिये..क्या भेद है? …नहीं नहीं .. कभी उन्हें स्याह की बारिकीयों से पन्नों पे सजाया है .. किस जादू के रूप में सज जाते हैं .. वो भी इक माजरा है .. कोशिश कीजियेगा कभी .. अजीब सी सादगी पे रूह रोशन सी लगती है!

कुछ यूँ ही स्याह दीप्ती ने बांधे रखा है .. आज जब उलझी ढून्ढ ही रही थी अपने कुछ ख़ास दोस्तों के  “जादुई पन्नों” में.. के क्या नाम दूं . … जादुई पन्ने! … 🙂  पहले निदा फाजली को जगाया ….वो कुछ यूँ मुखातिब हुए के हम उनकी  खूबसूरत आवाज़ में खो गए.. कौन सी वाली अरे वही..हाँ यही ..

चाँद से फूल से

चाँद से फूल से या मेरी

ज़बां से सुनिए

हर जगह आपका किस्सा है

जहां से सुनिए

सबको आता नहीं दुनिया को

सजाकर जीना

ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की

ज़बां से सुनिए

क्या ज़रूरी है की हर पर्दा

उठाया जाए

मेरे हालात भी अपने ही

मकां से सुनिए

मेरी आवाज़ ही पर्दा है

मेरे चेहरे का

मैं हूँ खामोश जहां मुझको

वहाँ से सुनिए

कौन पढ़ सकता है

पानी पे लिखी  तहरीरें

किसने क्या लिखा है ये

आबें रवां से सुनिए

चाँद में कैसे हुई कैद

किसी घर की ख़ुशी

ये कहानी किसी मस्जिद की

अजां से सुनिए … 🙂

(निदा फाजली )

हमारे चेहरे का रंग यूँ खिला के हमने तीन चार बार तो यूँ ही पढ़ डाला और खुश हो लिए… जादुई पन्ना जो था .. आप पूछोगे जादुई पन्ना क्या है …

स्याह की छुवन से कोरे कागज़ पे बने वो निशाँ जो जाने क्या जादू रखते हैं… तिलिस्म के रहस्य सा .. उन्हें यूँ आँख बंद खोलो और वो खिलखिला के मेहक उठते हैं ….काव्य की कोई भी जुबां हो.. खूबसूरत है.. और हिन्दुस्तानी में वो लज्ज़त ऐ बहार है के क्या कहें…

फिर भटक गयी… खैर.. तो जब कुछ तय न हुआ तो खुसरो को उठाया.. वो जो उन्होंने खालिकबारी में उलझाया के हम डूबे रहे.. ग़ालिब दरवाज़ा खटखटा ही रहे थे.. अब ते किया के उनकी भी सुन ही लेते हैं.. वो कुछ बोलते रहे हम सुनते रहे.. वो अकसर बोला करते हैं.. पर फिर भी नहीं.. जँचा..खालिकबारी में खुशखबर पढ़ा था.. तो उम्मीद थी के बस आज तो मिलेगा.. संकेत शब्दों ने दे दिया है..  🙂 ..

पर वक़्त बेरहम है

न जाने क्यूँ

इतना घुमाता है

जाने उसे घुमाने में

कितना मज़ा आता है..

…ज़फर को बोला..फ़िराक बच्चन,प्रीतम, फैज़ झाँक रहे थे.. नीरज ने भी कुछ कह दिया था.. पर फैसला न हो रहा था.. .खैर हमने कहा हो न हो.. आज ही लिखेंगे.. हम भी ढीठ हैं …आज ही करेंगे..

तभी अपने ही कलम की कुछ याद ताज़ा हुई.. इक इखलास की तस्वीर ..गोया जिसके नीचे हमारी आधी से जियादा कलम चलती है. .. जाने कहाँ वो उभर आयी…खिल से गए.. अरे यही तो.. मेरी स्याह दीप्ती..

स्याह दीप्ती!

सवेरे सुनहरी किरण की निधि
अपनी मुट्ठी में भींच चुपके से भागे थे
ये जाने क्यूँ दिन भर सूरज ने
पीछा जहाँ तंहा किया

सांसे रोके घूरा भी था
पास तो तुम्हारे पूरा था
हमने थोड़ी सी ली थी
उसपे भी निगाहे जड़ी थीं

क्यूँ बताऊँ क्यूँ लिया
साँझ के नीले होते सियाही को देखा है
उसकी तरफ जो पीठ पीछे करते हो
ना जाने क्यूँ उससे मुंह फेरते हो

कान लगा गर जो बुदबुदाते हो
तो सुनो हमारी बात
किरण किरण जुटाए हैं हम
स्याह दीप्ती का संसार

तृप्ति

(March 9, 2014)

तो स्याह दीप्ती के संसार में आपका स्वागत है …. शुरुआत तो हो चुकी थी …पर हाँ इक जगह ते कर ली है..जाने कौन कौन सी रौशनी झांके कौन कौन से अँधेरे भागे.. . कोशिश है .. उम्मीद है .. 🙂

कोशिश की कमान !

पंडित तिरपाठी
थे हमारे सहपाठी
पत्री हमारी देखके
बोले मिसिरा जी
बाकि तो सब ठीक है
पर बात एक हो ध्यान
कोशिश की कमान
साथ रखें श्रीमान
भाग्य ज़रा चपल है
मेहनत में बल है
पर कोशिश है
तो आप सबल हैं
ये कमान कहाँ मिलेगी?
तीर भी चाहिये होगा
पंडितजी !!!
ठहरे हम पंडित आदमी
तीर कमान बस की नाही
मिसिरा जी धीरज भाई
हडबडाते बहुत हैं
थोडा ये समझिये
कोशिश जब हो कमान
छोडिये तीर पे
दम का ईमान
लगे रहिये ..
कोशिश की कमान
नित अभ्यास है श्रीमान !
लगे रहिये..
हम भी भोले …बोले
ठीक है पंडितजी
“अरे कमान
कम ऑन”

तृप्ति (April 17, 2015)