बेवजह…मूढ़ लोग!

आजकल नाराज़ होना आसाँ हो गया है… खुद से नाराजी नहीं होती… खबर ही खबर है और हर खबर पे नाराज़ी.. नाराज़ी है तो कोई गुनेहगार भी… कोई गुनेहगार है तो सजा का हक़दार भी … बड़ा आसाँ सा हो चला है नाराज़गी का कारोबार … सब आप ही कोतवाल है आप ही जज … सजा तय हो जाती है … कुसूरवार का नाम ले दस पांच बातें हो जाती हैं … और फिर… फिर सब एक ठंडी नींद ले दूसरे दिन फिर किसी कुसूरवार को ढूंढते हैं .. भाई नाराज़ी के कारोबार हैं.. नाराज़ होना अब जन्मसिद्ध अधिकार… अभिव्यक्ति  … बकरा ढूंढ … चैन की नींद दे देती है… कहो नाराज़गी में कुछ लिखा क्या…कोई नहीं कल लिख देना… नहीं तो बोल देना…

क्यूँ  पूछना खुद से … बेवजह… खुद को अपराधबोध से मुक्ति कैसे मिले… जिम्मेवारी जब किसी पे डाल दी जाती है तो फिर हम आज़ाद हो जाते हैं … फिर अपनी जिम्मेवारी का एहसास नहीं कचोटता … फिर कोई अपराधबोध दरवाज़ा नहीं खटखटाता …क्यूँ दे उसे खटखटाने वो रूह टटोलता है… कई सवाल करता है… आपका आपके हिस्से का सवाल पूछता है… क्यूँ दो उसे अन्दर आने … बेवजह … हथकड़ियां हैं न उस बेवक़ूफ़ के हाथ …हाँ हाँ …वही … वो …

खुद से नाराजी क्यूँ हो भला …इतनी नाराज़ी की लडाई लड़ी… भगत सिंह सी … मुंह तोड़ जवाब दिया है.. पीठ थपथपा चैन हुआ है… भारतीयता का परिचय हुआ है…

जब लडखडाई सी आत्मा कभी कहीं नींद में … बडबडा देती है तो उसे सपना दिखा देते हैं …

आज़ादी के ये फालतू के जिम्मेदारी वाले  सवाल  … क्या कर सकती हूँ मैं … क्या किया मैंने… कैसे बेहतर किया जा सके इसे क्या वजेह थी के ये हुआ… क्या करूँ के फिर न हो… मेरा क्या योगदान हो सकता है इस सबमें … या मेरी क्या भूमिका होगी इसे बेहतर बनाने में … 

पर ये धैर्य की सोच थी … गहरी थी… कुछ परिश्रम कुछ कर्म की बात थी… इसकी फुर्सत किसे है… नाराजी बता दी … काम हो गया …

हाँ हैं कुछ बेवजह  वाले लोग … हैं लोग जो इसके लिए तनख्वाह पा रहे हैं … और कुछ और मूढ़ लोग जो दिन रात दुरुस्ती में लगे हैं … नाराज़ी है उन्हें भी  …हाँ… पर उसके बाद कुछ सवाल हैं … अपने आप से … और अपनी भूमिका पे … और वो कुछ तार सुधारने में लगे हैं … भला और किसे फुर्सत है… जाने कैसे मूढ़ लोग

बहोत शोर है … पर इस शोर भरी राष्ट्रवादिता में नए साहसी कदम कम दिखते हैं … एक दूसरे की तरफ गलतियों की पंचायत ज़रूर बैठने लगी है..

बिगड़े हुए को बिगड़ा कहना आसाँ तो है …उसे ठीक करना कैसा रहेगा …

सुस्त अस्पताल के कर्मचारी ..सुस्त चिकित्सक … पर ऐसी किस चीज़ ने उस कंपनी को इंसानियत भूलने  पे मजबूर कर दिया .. …देश के सभी बड़े मिनिस्टर और प्रधानमंत्री ट्विटर पे हैं … एक बात लिखी जाती … तो क्या उसपे कोई कार्यवाही नहीं होती…  ख़त लिख कर कह देते .. पैसे नहीं  मिले हैं… पर हम एक भी जान जाने नहीं देंगे … पर मदद कर दो ..ऐसे कितने दिन चलेंगे … अस्पताल था कोई फैक्ट्री नहीं की प्रोडक्शन रुक जाता … कोई घर का चूल्हा नहीं की खाना नहीं बनता… वहां लोगो की… मासूम बच्चों की जान का सवाल था… ऐसी क्या मजबूरी थी… इंसानियत ने सोचना समझना और दौड़ना बंद कर दिया था.. पैसा न मिलना … एक बहोत बड़ी गलती … और परिणाम जानते  हुए भी ये कदम उठाना उससे बड़ी लापरवाही…

आपस में सिर्फ  अब ये कहना ज़रूरी हो गया है भाई इंसान ही समझते हो न… पता नहीं डर लगता है…

ये लो एक और नाराज़ी ….क्यूँ भाई आज़ाद देश में हैं आप… मूढ़ लोग !

Right to Speech है मैडम जी…Right to Responsible Behaviour nahin!… ये खुद की  constitution में लिखा जाता है …ये देखिये हमको किसे ने बताया ही नहीं… लापरवाह …मूढ़ लोग…

” खुद से सवाल …कुछ बेमिसाल
कुछ हुआ हो तो कमाल है …
वरना फिर साल दर साल है….

और बाल की खाल है

 

तृप्ति

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