चम्पई चाँदनी !

शाम को घर को आते वक़्त चाँद से खफा हो गए पूछो क्यूँ … इक तो यूँ अचानक दिख गए …हमारी हंसी खिल गयी और हमने सोचा क्यूँ न इनका बारिकपन अपने फ़ोन के कैमरे में कैद कर लें …जब तलक फ़ोन लेके वापिस मुड़े …जनाब बादलों में गुम… अब ये तो केह नहीं सकते थे..थोडा रुको चाँद को बादलों से निकलने दो कुछ तस्वीरे ले लूं फिर घर चलते हैं… सो बैठ गए कार में.. फिर उसी सड़क के लम्बे रास्तों पे जिसपे जमे लोग चलते कम हैं जाम जियादा लगाते हैं … शायद कार में बैठने का एहसास दिल को सुकूं के किसी कोने में ले जाता है वरना ऐसी ट्रैफिक की रेंगती तस्वीर होती है  की कछुआ भी कहे … ये लोग खामखा की मशीनें बनाते हैं … सब की सब ट्रैफिक की बलि चढ़ ही जाते हैं…

आंखें यूँ जल बुझ रहीं थीं के कहाँ पहुंचे ये जानने की भी कोशिश नहीं कर रहे थे… जा रहें हैं पहुँच जायेंगे…

तभी कुछ दिखा … क्या था.. खूबसूरत… एक पेड़ जिसके फूल टिमटिमा रहे थे दूधिया सी रौशनी में … ऐसा लगा जैसे किसी बच्चे ने एक खूबसूरत पेंटिंग की हो और सारे फूल करीने से उसपे सजा दिए हों… मेरी हरकत ऐसी ही थी के मुझे हिला कर कहा गया भी … तुम ठीक तो हो …ऐसे कैसे देख रही हो… पर … ये तो होना था…

दिल्ली के साउथ एक्स मार्किट में कई पेड़ हैं बड़ी बड़ी दुकानों के आस पास. पर कुछ ख़ास ही होगा ये पेड़ जिसके सारे फूल यूँ चमचमा रहे थे… यूँ तो सारा बाज़ार रोशन था …पर इन सब रोशनियों में वो पेड़ अलग सा था…क्यूँ..

पता कैद करने की कोशिश की. पेड़ के पीछे ही Titan का शोरूम है … Titan घडी …

घडी के शोरूम के ठीक  सामने … दूधिया चांदनी नहीं चम्पई चांदनी वाला पेड़… समय …

हाँ समय …कुछ कह रहा था शायद…

मैंने पलट कुछ समझाना चाहा ….. कुछ बोला … नहीं अपनी घडी नहीं देखी…उस पेड़ को मैंने हमेशा के लिए कैद कर लिया था .