स्याह दीप्ती!

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स्पंदन है ..स्नेह है ..स्निग्ध.. जीवन है.. क्या ?.. सूरज की किरणों में घूम के देखिये .. उसका एक कण चुरा के देखिये..क्या भेद है? …नहीं नहीं .. कभी उन्हें स्याह की बारिकीयों से पन्नों पे सजाया है .. किस जादू के रूप में सज जाते हैं .. वो भी इक माजरा है .. कोशिश कीजियेगा कभी .. अजीब सी सादगी पे रूह रोशन सी लगती है!

कुछ यूँ ही स्याह दीप्ती ने बांधे रखा है .. आज जब उलझी ढून्ढ ही रही थी अपने कुछ ख़ास दोस्तों के  “जादुई पन्नों” में.. के क्या नाम दूं . … जादुई पन्ने! … 🙂  पहले निदा फाजली को जगाया ….वो कुछ यूँ मुखातिब हुए के हम उनकी  खूबसूरत आवाज़ में खो गए.. कौन सी वाली अरे वही..हाँ यही ..

चाँद से फूल से

चाँद से फूल से या मेरी

ज़बां से सुनिए

हर जगह आपका किस्सा है

जहां से सुनिए

सबको आता नहीं दुनिया को

सजाकर जीना

ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की

ज़बां से सुनिए

क्या ज़रूरी है की हर पर्दा

उठाया जाए

मेरे हालात भी अपने ही

मकां से सुनिए

मेरी आवाज़ ही पर्दा है

मेरे चेहरे का

मैं हूँ खामोश जहां मुझको

वहाँ से सुनिए

कौन पढ़ सकता है

पानी पे लिखी  तहरीरें

किसने क्या लिखा है ये

आबें रवां से सुनिए

चाँद में कैसे हुई कैद

किसी घर की ख़ुशी

ये कहानी किसी मस्जिद की

अजां से सुनिए … 🙂

(निदा फाजली )

हमारे चेहरे का रंग यूँ खिला के हमने तीन चार बार तो यूँ ही पढ़ डाला और खुश हो लिए… जादुई पन्ना जो था .. आप पूछोगे जादुई पन्ना क्या है …

स्याह की छुवन से कोरे कागज़ पे बने वो निशाँ जो जाने क्या जादू रखते हैं… तिलिस्म के रहस्य सा .. उन्हें यूँ आँख बंद खोलो और वो खिलखिला के मेहक उठते हैं ….काव्य की कोई भी जुबां हो.. खूबसूरत है.. और हिन्दुस्तानी में वो लज्ज़त ऐ बहार है के क्या कहें…

फिर भटक गयी… खैर.. तो जब कुछ तय न हुआ तो खुसरो को उठाया.. वो जो उन्होंने खालिकबारी में उलझाया के हम डूबे रहे.. ग़ालिब दरवाज़ा खटखटा ही रहे थे.. अब ते किया के उनकी भी सुन ही लेते हैं.. वो कुछ बोलते रहे हम सुनते रहे.. वो अकसर बोला करते हैं.. पर फिर भी नहीं.. जँचा..खालिकबारी में खुशखबर पढ़ा था.. तो उम्मीद थी के बस आज तो मिलेगा.. संकेत शब्दों ने दे दिया है..  🙂 ..

पर वक़्त बेरहम है

न जाने क्यूँ

इतना घुमाता है

जाने उसे घुमाने में

कितना मज़ा आता है..

…ज़फर को बोला..फ़िराक बच्चन,प्रीतम, फैज़ झाँक रहे थे.. नीरज ने भी कुछ कह दिया था.. पर फैसला न हो रहा था.. .खैर हमने कहा हो न हो.. आज ही लिखेंगे.. हम भी ढीठ हैं …आज ही करेंगे..

तभी अपने ही कलम की कुछ याद ताज़ा हुई.. इक इखलास की तस्वीर ..गोया जिसके नीचे हमारी आधी से जियादा कलम चलती है. .. जाने कहाँ वो उभर आयी…खिल से गए.. अरे यही तो.. मेरी स्याह दीप्ती..

स्याह दीप्ती!

सवेरे सुनहरी किरण की निधि
अपनी मुट्ठी में भींच चुपके से भागे थे
ये जाने क्यूँ दिन भर सूरज ने
पीछा जहाँ तंहा किया

सांसे रोके घूरा भी था
पास तो तुम्हारे पूरा था
हमने थोड़ी सी ली थी
उसपे भी निगाहे जड़ी थीं

क्यूँ बताऊँ क्यूँ लिया
साँझ के नीले होते सियाही को देखा है
उसकी तरफ जो पीठ पीछे करते हो
ना जाने क्यूँ उससे मुंह फेरते हो

कान लगा गर जो बुदबुदाते हो
तो सुनो हमारी बात
किरण किरण जुटाए हैं हम
स्याह दीप्ती का संसार

तृप्ति

(March 9, 2014)

तो स्याह दीप्ती के संसार में आपका स्वागत है …. शुरुआत तो हो चुकी थी …पर हाँ इक जगह ते कर ली है..जाने कौन कौन सी रौशनी झांके कौन कौन से अँधेरे भागे.. . कोशिश है .. उम्मीद है .. 🙂

कोशिश की कमान !

पंडित तिरपाठी
थे हमारे सहपाठी
पत्री हमारी देखके
बोले मिसिरा जी
बाकि तो सब ठीक है
पर बात एक हो ध्यान
कोशिश की कमान
साथ रखें श्रीमान
भाग्य ज़रा चपल है
मेहनत में बल है
पर कोशिश है
तो आप सबल हैं
ये कमान कहाँ मिलेगी?
तीर भी चाहिये होगा
पंडितजी !!!
ठहरे हम पंडित आदमी
तीर कमान बस की नाही
मिसिरा जी धीरज भाई
हडबडाते बहुत हैं
थोडा ये समझिये
कोशिश जब हो कमान
छोडिये तीर पे
दम का ईमान
लगे रहिये ..
कोशिश की कमान
नित अभ्यास है श्रीमान !
लगे रहिये..
हम भी भोले …बोले
ठीक है पंडितजी
“अरे कमान
कम ऑन”

तृप्ति (April 17, 2015)