आज की लौ!

“साद कुछ ज़मीन पे छोड़ ही आओ

सुखन सादगी की छेड़ ही आओ

…. कुछ गुमशुदा सी है आप सी सूरत

कुछ कम बोलती है आपकी मूरत

थोड़ी सी झलक दिखा ही आओ

थोड़ी से और बोल दे ही आओ …..

लिख नहीं रहे क्या कलम तुम्हारे

या गुम कहीं हैं तुम्हारे इरादे

कुछ कलम से खेंच ही आओ

कुछ इरादों से मिल ही आओ …

इधर उधर में खो रहे हो

आप सा आप

कुछ खुद से मिल आओ

कुछ आप ले आओ ”

तृप्ति

 

“कहते हैं के दिल के फरेब पे बैठा है पागल,

वो आजमाईश ही क्या ….के जो नहीं हुआ घायल !

जो मुक्क़दस इक राह ऐसी मिले

हाँ  फ़रिश्ता जो चाह का मिले  !

ऐसी बंदिश जो आसमां से मिले

तो रुबाईयाँ भी रूह की मिले !

 

 

तृप्ति